|
True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT) |



|
151- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें फ़ित्नों से डराया गया है) मैं ख़ुदा की हम्द व सना करता हूँ और उसकी मदद चाहता हूँ उन चीज़ों के लिये जो शयातीन को हंका सकें, भगा सकें और उसके फन्दों और हथकण्डों से महफ़ूज़ रख सकें और मैं उस अम्र की गवाही देता हूं के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और हज़रत मोहम्मद (स0) उसके बन्दे और रसूल, उसके मुन्तख़ब और मुस्तफ़ा हैं उनके फ़ज़्ल का कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता है और उनके फ़िक़दान की कोई तलाफ़ी नहीं है। उनकी वजह से तमाम शहर ज़लालत की तारीकी, जेहालत के ग़लबे और बदसरषती और बद एख़लाक़ी की षिद्दत के बाद जब लोग हराम को हलाल बनाए हुए थे और साहबाने हिकमत को ज़लील समझ रहे थे, रसूलों से ख़ाली दौर में ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे और कुफ्ऱ की हालत में मर रहे थे, मुनव्वर और रौषन हो गए। (फ़ित्नों से आगाही) इसके बाद तुम ऐ गिरोहे अरब उन बलाओं के निषाने पर हो जो क़रीब आ चुकी हैं लेहाज़ा नेमतों की मदहोषियों से बचो और हलाक करने वाले अज़ाब से होषियार रहो। अन्धेरों के धुन्धलकों में क़दम जमाए रहो और फ़ित्नों की कजरवी से होषियार हो जिस वक़्त उनका पोषीदा ख़दषा सामने आ रहा हो और मख़फ़ी अन्देषा ज़ाहिर हो रहा हो और खूंटा मज़बूत हो रहा हो। यह फ़ित्ने इब्तेदा में मख़फ़ी रास्तों से शुरू होते हैं और आखि़र में वाज़ेअ मसाएब तक पहुंच जाते हैं। इनका आग़ाज़ बच्चों के आग़ाज़ जैसा होता है लेकिन इनके आसार नक़ष काले हजर जैसे होते है। दुनिया के ज़ालिम बाहमी अहद व पैमान के ज़रिये उनके वारिस बनते हैं। अव्वल आखि़र का क़ाएद होता है और आखि़र अव्वल का मुक़तदी। हक़ीर दुनिया के लिये एक दूसरे से मुक़ाबला करते हैं और बदबूदार मुर्दे पर आपस में जंग करते हैं। (((-सही बुख़ारी के किताबुलफ़ित्न में इसी सूरते हाल की तरफ़ इषारा किया गया है के जब रसूले अकरम (स0) हौज़े कौसर पर बाज़ असहाब का हष्र देख कर उन्हें हंकाया जा रहा है। फ़रयाद करेंगे के ख़ुदाया मेरे असहाब हैं तो इरषाद होगा के तुम्हें नहीं मालूम के इन्होंने तुम्हारे बाद क्या-क्या बिदअतें ईजाद की हैं और किस तरह दीने ख़ुदा से मुनहरिफ़ हो गए हैं। इन्सानी बसीरत का सबसे बड़ा कारनामा यह है के इन्सान फ़ित्ने को पहले मरहले पर पहचान ले और वहीं उसका सदबाब कर दे वरना जब उसका रिवाज हो जाता है तो उसका रोकना नामुमकिन हो जाता है लेकिन मुष्किल यह है के इसका आग़ाज़ इतने मख़फ़ी और हसीन अन्दाज़ से होता है के उसका पहचानना हर एक के बस का काम नहीं है और इस तरह अवामुन्नास अपने मनहूस अक़ायद व नज़रियात या अवातिफ़ व जज़्बात की बिना पर फ़ितनों का षिकार हो जाते हैं और आखि़र में उनकी मुसीबत का इलाज नामुमकिन हो जाता है। ओलमा, आलाम और मुफ़क्केरीने इस्लाम की ज़रूरत इसीलिये होती है के वह फ़ित्नों को आग़ाजकार ही से पहचान सकते हैं और उनका सद्दबाब कर सकते हैं बषर्ते के अवामुन्नास उनके ऊपर एतमाद करें और उनकी बसीरत से फायदा उठाने के लिये तैयार हों।-))) जबके अनक़रीब मुरीद अपने पीर और पीर अपने मुरीद से बराअत करेगा और बुग़्ज़ व अदावत के साथ एक दूसरे से अलग हो जाएंगे और वक़्ते मुलाक़ात एक-दूसरे पर लानत करेंगे, इसके बाद वह वक़्त आएगा जब ज़लज़लए अफ़गन फ़ित्ना सर उठाएगा जो कमर तोड़ होगा और शदीद तौर पर हमलावर होगा। जिसके नतीजे में बहुत से दिल इस्तेक़ामत के बाद कजी का षिकार हो जाएंगे और बहुत से लोग सलामती के बाद बहक जाएंगे। इसके हुजूम के वक़्त ख़्वाहिषात में टकराव होगा और उसके ज़हूर के हंगाम अफ़्कार मुष्तबा हो जाएंगे। जो उधर सर उठाकर देखेगा उसकी कमर तोड़ देगे और जो उसमें दौड़ धूप करेगा उसे तबाह कर देंगे। लोग यूँ एक-दूसरे को काटने दौड़ेंगे जिस तरह भीड़ के अन्दर गधे। ख़ुदाई रस्सी के बल खुल जाएंगे और हक़ाएक़ के रास्ते मुष्तबा हो जाएंगे। हिकमत का चष्मा ख़ुष्क हो जाएगा और ज़ालिम बोलने लगेंगे। देहातियों को हथोड़ों से कूट दिया जाएगा और अपने सीने से दबाकर कुचल दिया जाएगा। अकेले अकेले अफ़राद उसके ग़ुबार में गुम हो जाएंगे और उसके रास्ते में सवार हलाक हो जाएंगे। यह फ़ित्ने क़ज़ाए इलाही की तल्ख़ी के साथ वारिद होंगे और दूध के बदले ताज़ा ख़ून निकालेंगे। दीन के मिनारे (ओलमा) हलाक हो जाएंगे और यक़ीन की गिरहें टूट जाएंगी, साहेबाने होष उनसे भागने लगेंगे और ख़बीसुन्नफ़्स अफ़राद इसके मदारे इलहाम हो जाएंगे। यह फ़ितने गरजने वाले चमकने वाले और सरापा तैयार होंगे। उनमें रिष्तेदारों से ताल्लुक़ात तोड़ लिये जाएंगे और इस्लाम से जुदाई इख़्तेयार कर ली जाएगी। उससे अलग रहने वाले भी मरीज़ होंगे और कूच कर जाने वाले भी गोया मुक़ीम ही होंगे। (((- अमीरूल मोमेनीन (अ0) जिस क़िस्म के फ़ित्नों की तरफ़ इषारा किया है उनका सिलसिला अगरचे आपके बाद से ही शुरू हो गया था लेकिन अभी तक मौक़ूफ़ नहीं हुआ और न फ़िलहाल मौक़ूफ़ होने के इमकानात हैं। जिस तरफ़ देखो वही सूरते हाल नज़र आ रही है जिसकी तरफ़ आपने इषारा किया है और उन्हीं मज़ालिम की गरम बाज़ारी है जिनसे आपने होषियार किया है। ज़रूरत है के साहेबाने ईमान हिदायत से फ़ायदा उठाएं, फ़ित्नों से महफ़ूज़ रहें, साहेबाने बसीरत से वाबस्ता रहें और कम से कम इतना ख़याल रखें के ख़ुदा की बारगाह में मज़लूम बन कर हाज़िर होने में कोई ज़िल्लत नहीं है बल्कि उसी में दाएमी इज्ज़त और अबदी शराफ़त है। ज़िल्लत ज़ुल्म में होती है मज़लूमियत में नहीं-))) 152- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें परवरदिगार के सिफ़ात और आइम्माए ताहेरीन (अ0) के औसाफ़ का ज़िक्र किया गया है) सरी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये हैं जिसने अपनी तख़लीक़ से अपने वजूद का, अपनी मख़लूक़ात के जादिस होने से अपनी अज़लियत का और उनकी बाहेमी मुषाबेहत से अपने बेनज़ीर होने का पता दिया है। उसकी ज़ात तक हवास की रसाई नहीं है और फिर भी परदे उसे पोषीदा नहीं कर सकते हैं। (आइम्माए (अ0) दीन) देखो तुलूअ करने वाला तालेअ हो चुका है और चमकने वाला रौषन हो चुका है, ज़ाहिर होने वाले का ज़हूर सामने आ चुका है, कजी सीधी हो चुकी है और अल्लाह एक क़ौैम के बदले दूसरी क़ौम और एक दौर के बदले दूसरा दौर ले आया है। हमने हालात में इन्क़ेलाब का उसी तरह इन्तेज़ार किया है जिस तरह क़हत ज़दा बारिष का इन्तेज़ार करता है। आइम्मा दर हक़ीक़त अल्लाह की तरफ़ से मख़लूक़ात के निगरां और अल्लाह के बन्दों पर उसकी मारेफ़त का सबक़ देने वाले हैं। कोई शख़्स जन्नत में क़दम नहीं रख सकता है जब तक वह उन्हें न पहचान ले और आइम्मा हज़रात उसे अपना न कह दें और कोई शख़्स जहन्नुम में जा नहीं सकता है मगर यह के वह इन हज़रात का इन्कार कर दे और वह भी उसे पहचानने से इन्कार कर दें। परवरदिगार ने तुम लोगों को इस्लाम से नवाज़ा है और तुम्हें उसके लिये मुन्तख़ब किया है। इसलिये के इस्लाम सलामती का निषान और उम्मत का सरमाया है। अल्लाह ने इसके रास्ते का इन्तेख़ाब किया है। इसके दलाएल को वाज़ेअ किया है। ज़ाहिरी इल्म और बातिनी हुकूमतों के मानिन्द इसके ग़राएब फ़ना होने वाले और इसके अजाएब ख़त्म होने वाले नहीं हैं। इसमें नेमतों की बहार और ज़ुल्मतों के चिराग़ हैं। नेकियों के दरवाज़े इसकी कुन्जियों से खुलते हैं और तारीकियों का इज़ाला इसी के चराग़ों से होता है। इसने अपने हुदूद को महफ़ूज़ कर लिया है। उसने अपनी चरागाह को आम कर दिया है। इसमें तालिबे षिफ़ा के लिये षिफ़ा और उम्मीदवार किफ़ायत के लिये बेनियाज़ी का सामान मौजूद है। 153- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (गुमराहों और ग़ाफ़िलों के बारे में) (गुमराह) यह इन्सान अल्लाह की तरफ़ से मोहलत की मन्ज़िल में है, ग़ाफ़िलों के साथ तबाहियों के गढ़े में गिर पड़ता है और मक्कारों के साथ सुबह करता है। न इसके सामने सीधा रास्ता है और न क़यादत करने वाला पेषवा। (ग़ाफ़ेलीन) यहाँ तक के जब परवरदिगार ने उनके गुनाहों की सज़ा को वाज़ेअ कर दिया और उन्हें ग़फ़लत के पर्दों से बाहर निकाल दिया तो जिससे मुंह फिराते थे उसी की तरफ़ दौड़ने लगे और जिसकी तरफ़ मुतवज्जो थे उससे मुंह फिराने लगे। जिन मक़ासिद को हासिल कर लिया था उससे भी कोई फ़ायदा नहीं उठाया और जिन हाजतों को पूरा कर लिया था उनसे भी कोई नतीजा नहीं हासिल हुआ! देखो मैं तुम्हें और ख़ुद अपने नफ़्स को भी इस सूरते हाल से होषियार कर रहा हूँ। हर शख़्स को चाहिये के अपने नफ़्स से फ़ायदा उठाए। साहेबे बसीरत वही है जो सुने तो ग़ौर भी करे और देखे तो (हक़ीक़तों पर) निगाह भी करे और फिर इबरतों से फ़ायदा हासिल करके उस रौषन रास्ते पर चल पड़े जिसमें गुमराही के गड्ढ़े में गिरने से परहेज़ करे और शुबहात में पड़कर गुमराह न हो जाए। हक़ से बेराह होने और बात में रद्दो बदल करने और सच्चाई में ख़ौफ़ खाने से गुमराहियों की मदद करके ज़ियाँकार न बने। (हक़ के खि़लाफ़ गुमराहों की इस तरह मदद न करे के हक़ की राह से इन्हेराफ़ कर ले या गुफ़्तगू में तहरीफ़ से काम ले या सच बोलने का षिकार हो रहा हो।) मेरी बात सुनने वालों! अपनी मदहोषी से होष में आ जाओ और अपनी ग़ज़ब (ग़फ़लत) से बेदार हो जाओ। सामाने दुनिया मुख़्तसर कर लो और उन निषानियों पर ग़ौरो फ़िक्र करो जो बातें तुम्हारे पास पैग़म्बर उम्मी (स0) की ज़बान मुबारक से आई हैं उनमें और जिनका इख़्तेयार करना ज़रूरी है (उनमें अच्छी तरह ग़ौरो फ़िक्र) करो के उनसे न कोई चारा है और न कोई गुरेज़ की राह। जो इस बात की मुख़ालफ़त करे उससे इख़्तेलाफ़ करके दूसरे रास्ते पर चल पड़ो और उसे उसकी मर्ज़ी पर चलने दो (के वह अपने नफ़्स की मर्ज़ी पर चलता है), फ़ख़्रो मुबाहात को छोड़ दो, तकब्बुर को ख़त्म कर दो (बुराई के सर को नीचा कर दो) और अपनी क़ब्र को याद रखो के इसी रास्ते से गुज़रना है और जैसा करोगे वैसा ही मिलेगा और जैसा बोओगे वैसा ही काटना है जो आज भेज दिया है कल उसी का सामना करना है। अपने क़दमों के लिये ज़मीन लो और उस दिन के लिये सामान पहले से भेज दो, होषियार होषियार ऐ सुनने वालों और मेहनत (कोषिष करो), मेहनत (कोषिष करो) ऐ ग़फलत वालों! मुझ जैसे बाख़बर की तरह कोई (दूसरा) न बताएगा। देखो! क़ुराने मजीद में परवरदिगार के मुस्तहकम उसूलों में जिस पर सवाब व अज़ाब और रिज़ा व नाराज़गी का दारोमदार है। यह बात है के इन्सान इस दुनिया में किसी क़द्र मेहनत क्यों न करे और कितना ही मुख़लिस क्यों न हो जाए अगर दुनिया से निकल कर अल्लाह की बारगाह में जाना चाहे और दर्ज ज़ैल ख़सलतों से तौबा न करे तो उसे यह जद्दो जेहद और एख़लास अमल कोई फ़ायदा नहीं पहुंचा सकता है। इबादत इलाही में किसी को शरीक क़रार दे अपने नफ़्स की तस्कीन के लिये किसी को हलाक कर दे, एक के काम पर दूसरों को लगा दे, दीन में कोई बिदअत ईजाद करके उसके ज़रिये लोगों से फ़ायदा हासिल करे, लोगों के सामने पालीसी इख़्तेयार करे, या दो ज़बानों के साथ ज़िन्दगी गुज़ारे उस हक़ीक़त को समझ लो के हर शख़्स अपनी नज़र की दलाी पाता है। ;(यह चीज़ है के किसी बन्दे को चाहे वह जो कुछ जतन करवा ले दुनिया से निकल कर अल्लाह की बारगाह में जाना ज़रा फ़ायदा नहीं पहुंचा सकता जबके वह इन ख़सलतों में से किसी एक ख़सलत से तौबा किये बग़ैर मर जाए एक यह के फ़राएज़े इबादत में किसी को इसका शरीक ठहराया हो या किसी को हलाक करके अपने ग़ज़ब को ठन्डा किया हो, या दूसरे के किये पर ऐब लगाया हो या दीन में बिदअतें डाल कर लोगों से अपना मक़सद पुरा किया हो या लोगों से दो रूख़ी चाल चलता हो या वह ज़बानों से लोगों से गुफ़्तगू करता हो इस बात को समझो इसलिये के एक नज़ीर दुसरी नज़ीर की दलील हुआ करती है।) यक़ीनन चैपायों का सारा हदफ़ उनका पेट होता है और दरिन्दों का सारा निषाना दूसरों पर ज़ुल्म होता है और औरतों का सारा ज़िन्दगानी मक़सद दुनिया की ज़ीनत और फ़साद पर होता है। लेकिन साहेबाने ईमान ख़ुज़ू व ख़ुषू रखने वाले, (मोमिन वह है जो तकब्बुर व ग़ुरूर से दूर हों) ख़ौफ़े ख़ुदा रखने वाले और उसकी बारगाह में तरसाँ और लरज़ाँ रहते हैं। 154 - आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें फ़ज़ाएले अहलेबैत (अ0) का ज़िक्र किया गया है) अक़्लमन्द वह है जो दिल की आंखों से अपने अन्जाम कार को देख लेता है और उसके नषेब व फ़राज़ को पहचान लेता है। दावत देने वाला दावत दे चुका है और निगरानी (निगेहदाष्त) करने वाला निगरानी का फ़र्ज़ अदा कर चुका है। अब तुम्हारा फ़रीज़ा है के दावत देने वाले की आवाज़ पर लब्बैक कहो और निगराँ (निगेहदाष्त करने वाले) के नक़्षे क़दम पर चल पड़ो। यह लोग फ़ित्नों के दरयाओं में डूब गए हैं और सुन्नत को छोड़कर बिदअतों को इख़्तेयार कर लिया है। मोमेनीन गोषा व किनार में दबे हुए हैं और गुमराह और इफ़तेराए परवाज़ मसरूफ़े कलाम हैं। दर हक़ीक़त हम अहलेबैत ही देन के निषान और उसके साथी, इसके एहकाम के ख़ज़ानेदार और इसके दरवाज़े हैं, ज़ाहिर है के घरों में दाखि़ल दरवाज़ों के बग़ैर नहीं हो सकता है वरना इन्सान चोर कहा जाता है। इन्हीं अहलेबैत (अ0) के बारे में क़ुरआने करीम की अज़ीम आयात हैं और यही रहमान के ख़ज़ानेदार हैं, यह जब बोलते हैं तो सच बोलते हैं और जब क़दम आगे बढ़ाते हैं तो कोई इन पर सबक़त नहीं ले जा सकता है। हर ज़िम्मेदार क़ौम का फ़र्ज़ है के अपने क़ौम से सच बोले और अपनी अक़ल को गुम न होने दे और फ़रज़न्दाने आख़ेरत में शामिल हो जाए के उधर ही से आया है और उधर ही पलट कर जाना है। यक़ीनन दिल की आंखों से देखने वाले और देख कर अमल करने वाले के अमल की इब्तेदा उसके इल्म से होती है के इसका अमल उसके लिये मुफ़ीद है या इसके खि़लाफ़ है। अगर मुफ़ीद है तो इसी रास्ते पर चलता रहे और अगर मुज़िर है तो ठहर जाए के इल्म के बग़ैर अमल करने वाला ग़लत रास्ते पर चलने वाले के मानिन्द है के जिस क़द्र रास्ते तय करता जाएगा मन्ज़िल से दूरतर होता जाएगा और इल्म के साथ अमल करने वाला वाज़ेअ रास्ते पर चलने के मानिन्द है। लेहाज़ा हर आंख वाले को यह देख लेना चाहिये के वह आगे बढ़ रहा है या पीछे हट रहा है और याद रखो के हर ज़ाहिर के लिये उसी का जैसा बातिन भी होता है लेहाज़ा अगर ज़ाहिर पाकीज़ा होगा तो बातिन भी पाकीज़ा होगा और अगर ज़ाहिर ख़बीस हो गया तो बातिन भी ख़बीस हो जाएगा। रसूले सादिक़ ने सच फ़रमाया है के ‘‘अल्लाह कभी कभी किसी बन्दे को दोस्त रखता है और उसके अमल से बेज़ार होता है और कभी अमल को दोस्त रखता है और ख़ुद उसी से बेज़ार रहता है। 155- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें चिमगादड़ की अजीब व ग़रीब खि़लक़त का ज़िक्र किया गया है) सरी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसकी मारेफ़त की गहराइयों से औसाफ़ आजिज़ हैं और जिसकी अज़मतों ने अक़्लों को आगे बढ़ने से रोक दिया है तो अब इसकी सल्तनतों की हदों तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं रह गया है। वह ख़ुदाए बरहक़ व आषकार है, उससे ज़्यादा साबित और वाज़ेअ है जो आंखों के मुषाहिदे में आ जाता है, अक़्लें उसकी हदबन्दी नहीं कर सकती हैं के वह किसी की शबीह क़रार दे दिया जाए और ख़यालात उसका अन्दाज़ा नहीं लगा सकते हैं के वह किसी की मिसाल बना दिया जाए। उसने मख़लूक़ात को बग़ैर किसी नमूने और मिसाल के और किसी मुषीर के मष्विरे या मददगार की मदद के बनाया है। उसकी तख़लीक़ उसके अम्र से तकमील हुई है और फिर उसी की इताअत के लिये सर ब सुजूद है और बिला तौक़फ़ उसकी आवाज़ पर लब्बैक कहती है और बग़ैर किसी इख़्तेलाफ़ के सामने सरनिगूं होती है। 156- आपका इरषादे गिरामी (जिसमें अहले बसरा से खि़ताब करके उन्हें हवादिस से बाख़बर किया गया है) ऐसे वक़्त में अगर कोई शख़्स अपने नफ़्स को सिर्फ़ ख़ुदा तक महदूद रखने की ताक़त रखता है तो उसे ऐसा ही करना चाहिये। फिर अगर तुम मेरी इताअत करोगे तो मैं तुम्हें इन्षाअल्लाह जन्नत के रास्ते पर चलाउंगा चाहे इसमें कितनी ही ज़हमत और तल्ख़ी क्यों न हो। रह गई फ़लां ख़ातून की बात तो उन पर औरतों की जज़्बाती राय का असर हो गया है और इस कीने ने असर कर दिया है जो उनके सीने में लोहार के कढ़ाव की तरह खौल रहा है। (((-इस लफ़्ज़ से मुरद मुसल्लम तौर पर हज़रत आइषा की ज़ात है लेकिन आपने उन्हें नाम के साथ क़ाबिले ज़िक्र नहीं क़रार दिया है और उनकी दो अज़ीम कमज़ारियों की तरफ़ मुतवज्जो किया है, एक यह है के इनमें आम औरतों की जज़्बाती कमज़ोरी पाई जाती है जो अक्सर एहकामे दीन और मर्ज़ीए परवरदिगार पर ग़ालिब आ जाती है जबके अज़वाजे रसूल (स0) को इस कमज़ोरी से बलन्दतर होना चाहिए, और दूसरी बात यह है के इनके दिल में कीना पाया जाता है के इनके बारे में रसूले अकरम (स0) के वह इरषादात नहीं हैं जो हज़रत अली (अ0) के बारे में हैं और उन्हें क़ुदरत ने क़ाबिले औलाद न बनाकर नस्ले अली (अ0) को नस्ले पैग़म्बर (स0) बना दिया है।-))) उन्हें अगर मेरे अलावा किसी और के साथ इस बरताव की दावत दी जाती तो कभी न आतीं लेकिन उसके बाद भी मुझे उनकी साबेक़ा हुरमत का ख़याल है। इनका हिसाब बहरहाल परवरदिगार के ज़िम्मे है। ईमान का रास्ता बिल्कुल वाज़ेअ और इसका चिराग़ मुकम्मल तौर पर नूर अफ़्षाँ है। ईमान ही के ज़रिये नेकियों का रास्ता हासिल किया जाता है और नेकियों ही के ज़रिये से ईमान की पहचान होती है। ईमान से इल्म की दुनिया आबाद होती है और इल्म से मौत का ख़ौफ़ हासिल होता है और मौत ही पर दुनिया का रास्ता है। (ईमान की राह सब राहों से वाज़ेअ और सब चिराग़ों से ज़्यादा नुरानी है ईमान से नेकियों पर इस्तेदलाल किया जाता है और नेकियों से ईमान पर दलील लाई जाती है, ईमान से इल्म की दुनिया आबाद होती है और इल्म की बदौलत मौत से डराया जाता है और दुनिया से आख़ेरत हासिल की जाती है।) और दुनिया ही के ज़रिये आख़ेरत हासिल की जाती है और आखि़रत ही में जन्नत को क़रीब कर दिया जाएगा और जहन्नम को गुमराहों के लिये बिल्कुल नुमायां किया जाएगा। मख़लूक़ात के लिये क़यामत से पहले कोई मन्ज़िल नहीं है। उन्हें इस मैदान में आखि़री मन्ज़िल की तरफ़ बहरहाल दौड़ लगाना है। यक़ीनन अम्रे बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुन्किर यह दो ख़ुदाई इख़्लाक़ हैं और यह न किसी की मौत को क़रीब बनाते हैं और न किसी की रोज़ी को कम करते हैं। तुम्हारा फ़र्ज़ है के किताबे ख़ुदा से वाबस्ता रहो के वही मज़बूत रसीमाने हिदायत और रौषन नूरे इलाही है। इसी में मनफ़अत बख़्ष षिफ़ा है और इसी में प्यास बुझाने वाली सेराबी है। वही तमस्सुक करने वालों के लिये वसीलए अज़मत किरदार है और वही राबेता रखने वालों के लिये ज़रियए निजात है। उसी में कोई कजी नहीं है जिसे सीधा किया जाए और उसी में इन्हेराफ़ नहीं है जिसे दुरूस्त किया जाए, मुसलसल तकरार उसे पुराना नहीं कर सकती है और बराबर सुनने से उसकी ताज़गी में फ़र्क़ नहीं आता है जो इसके ज़रिये कलाम करेगा वह सच्चा होगा और जो इसके मुताबिक़ अमल करेगा वह सबक़त ले जाएगा। (((-इन फ़िक़रों को देखने के बाद कोई शख़्स ईमान व अमल के राबते को नज़र अन्दाज़ नहीं कर सकता है और न ईमान को अमल से बे नियाज़ बना सकता है। ईमान से लेकर आख़ेरत तक इतना हसीन तसलसुल किसी दूसरे इन्सान के कलाम में नज़र नहीं आ सकता है और यह मौलाए कायनात की एजाज़े बयानी का एक बेहतरीन नमूना है। अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुन्किर के बारे में पैदा होने वाले “ौतानी वसवसों का जवाब इन कलेमात में मौजूद है और इन दोनों की अज़मत के लिये इतना ही काफ़ी है के न सिर्फ़ इन कामों में मालिक भी बन्दों के साथ शरीफ़ है बल्के उसने पहले अम्र व नहीं किया है। इसके बाद बन्दों को अम्र व नहीं का हुक्म दिया है। इस कुल्ले ईमान का किरदार जो ज़िन्दगी को हदफ़ और मक़सद नहीं बल्कि वसीलाए ख़ैरात तसव्वुर करता है और जब यह अन्दाज़ा हो जाता है के ज़िन्दगी की क़ुरबानी ही तमाम ख़ैरात, ज़कात का मक़सद है तो इस क़ुरबानी के नाम पर सजदए शुक्र करता है और लफ़्ज़े सब्र व तहम्मूल को बरदाष्त नहीं करता है।-))) बन्दगाने ख़ुदा! उस दिन से डरो जब आमाल की जांच पड़ताल की जाएगी और ज़लज़लों की बोहतात होगी के बच्चे तक बूढ़े हो जाएंगे। याद रखो ऐ बन्दगाने ख़ुदा! के तुम पर तुम्हारे ही नफ़्स को निगराँ बनाया गया है और तुम्हारे आज़ा व जवारेह तुम्हारे लिये जासूसों का काम कर रहे हैं और कुछ बेहतरीन मुहाफ़िज़ हैं जो तुम्हारे आमाल और तुम्हारी सांसों की हिफ़ाज़त कर रहे हैं। उनसे न किसी तारीक रात की तारीकी छिपा सकती है और न बन्द दरवाज़े उनसे ओझल बना सकते हैं। और कल आने वाला दिन आज से बहुत क़रीब है। आज का दिन अपना साज़ व सामान लेकर चला जाएगा और कल का दिन उसके पीछे आ रहा है, गोया हर शख़्स ज़मीन में अपनी तन्हाई की मन्ज़िल और गढ़े के निषान तक पहुंच चुका है। हाए वह तन्हाई का घर, वहषत की मन्ज़िल और ग़ुरबत का मकान, गोया के आवाज़ तुम तक पहुंच चुकी है और क़यामत तुम्हें अपने घेरे में ले चुकी है और तुम्हें आखि़री फ़ैसले के लिये क़ब्रों से निकाला जा चुका है। जहां तमाम बातिल बातें ख़त्म हो चुकी हैं और तमाम हीले बहाने कमज़ोर पड़ चुके, हक़ाएक़ साबित हो चुके हैं और उमूर पलट कर अपनी मन्ज़िल पर आ गए हैं। लेहाज़ा इबरतों से नसीहत हासिल करो। तग़य्युराते ज़माना से इबरत का सामान फ़राहम करो और फिर डराने वाले की नसीहत से फ़ायदा उठाओ। |